
रक्सौल, पूर्वी चंपारण।
मनुष्य के जीवन में जन्म और मृत्यु दो ऐसे सत्य हैं, जिन पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है। लेकिन इन दोनों के बीच मिलने वाला जीवन कैसे जीना है, यह बहुत हद तक हमारे विचारों, निर्णयों और कर्मों पर निर्भर करता है। बीते हुए कल को बदलना संभव नहीं और आने वाले कल की पूरी निश्चितता भी नहीं है। इसलिए जीवन की वास्तविक सुंदरता वर्तमान को समझने, स्वीकार करने और उसे बेहतर बनाने में है।
आज में आनंदपूर्वक जीना ही जीवन जीने की सच्ची कला है। बीते कल की गलतियों से सीखें, आने वाले कल के लिए अच्छे कर्म करें और आज को चिंता में गंवाने के बजाय सकारात्मकता के साथ जिएं।
जीवन में अनेक समस्याएं ऐसी होती हैं, जो समय के साथ अपने आप हल हो जाती हैं। लेकिन कभी-कभी हमारी जल्दबाजी, नकारात्मक सोच और अनावश्यक प्रतिक्रियाएं छोटी-सी परेशानी को भी बड़ा बना देती हैं। चिंता शरीर की ऊर्जा को कमजोर करती है और मन की शांति को धीरे-धीरे छीन लेती है। इसलिए हर परिस्थिति में घबराने के बजाय धैर्य, विवेक और आत्मविश्वास बनाए रखना आवश्यक है।
हमारा भविष्य केवल हमारी इच्छाओं से नहीं, बल्कि आज किए गए कार्यों से बनता है। जो व्यक्ति वर्तमान में अपने समय, विचारों और कर्मों का सही उपयोग करता है, वही अपने आने वाले कल को बेहतर बना सकता है। सफलता का रास्ता हमेशा आसान नहीं होता, लेकिन संघर्ष से पीछे न हटने वाला व्यक्ति एक दिन अपनी मेहनत से नई पहचान बनाता है। रात के अंधकार से गुजरने के बाद ही सूर्य का प्रकाश दिखाई देता है। इसी तरह कठिनाइयां भी हमें अनुभव, साहस और आगे बढ़ने की शक्ति देती हैं।
हमारे शब्द भी हमारे व्यक्तित्व का आईना होते हैं। शब्द बोलने में भले ही कोई कीमत न लगे, लेकिन उनका प्रभाव अनमोल हो सकता है। सही शब्द किसी के टूटे हुए मन को सहारा दे सकते हैं, जबकि कटु वचन वर्षों के संबंधों में दूरी पैदा कर सकते हैं। इसलिए बोलने से पहले यह सोचना जरूरी है कि हमारे शब्द किसी के जीवन में खुशी भरेंगे या दुख बढ़ाएंगे।
अच्छे विचार अच्छे लोगों के संपर्क, श्रेष्ठ साहित्य, सकारात्मक वातावरण और आत्मचिंतन से विकसित होते हैं। जब हमारी सोच बदलती है, तो हमारा व्यवहार बदलता है और व्यवहार में परिवर्तन से जीवन की दिशा बदलने लगती है। इसी प्रकार परमात्मा के प्रति सरल विश्वास और समर्पण मन को हल्का करता है। जब मनुष्य अहंकार छोड़कर बालक जैसी सहजता से ईश्वर के सामने स्वयं को समर्पित करता है, तब उसे आंतरिक शांति, प्रेम और मार्गदर्शन का अनुभव होता है।
जीवन में शांति पाने के लिए पूरी दुनिया को बदलना आवश्यक नहीं है। जैसे पूरी धरती पर कालीन बिछाने की अपेक्षा अपने पैरों में चप्पल पहन लेना अधिक सरल है, वैसे ही दूसरों की कमियां गिनाने के बजाय स्वयं में सुधार करना अधिक सार्थक है। हम दूसरों के विचारों और व्यवहार को हमेशा नियंत्रित नहीं कर सकते, लेकिन अपनी प्रतिक्रिया, अपनी भाषा और अपने आचरण को अवश्य बेहतर बना सकते हैं।
उक्त विचार लायंस क्लब इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 322ई जोन 41 के जोन चेयरपर्सन सह डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन एवं भारत विकास परिषद् रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।
रिश्तों की दुनिया भी बड़ी विचित्र है। समय के साथ अपनेपन की परिभाषा बदलती दिखाई देती है, फिर भी मनुष्य का हृदय अपनों से प्रेम, सम्मान और अपनत्व की अपेक्षा करता है। ऐसे में शिकायतों और अपेक्षाओं के बोझ से रिश्तों को कमजोर करने के बजाय विश्वास, संवेदना, संवाद और क्षमा से उन्हें मजबूत बनाना चाहिए।
वास्तव में, जीवन का दर्पण हमारा वर्तमान है। बीते हुए कल का पछतावा और आने वाले कल की चिंता छोड़कर यदि हम आज को प्रेम, विवेक, परिश्रम और सकारात्मक सोच के साथ जीना सीख लें, तो जीवन की अनेक उलझनें सरल हो सकती हैं। क्योंकि सुखी जीवन परिस्थितियों के पूरी तरह अनुकूल होने से नहीं, बल्कि हर परिस्थिति में सही दृष्टिकोण अपनाने से बनता है।




